हरिद्वार । तीर्थ नगरी हरिद्वार को लेकर किशोर उपाध्याय ने जो बयान दिया है ,यह बयान किशोर उपाध्याय ने चर्चित होने के लिए दिया है, या वास्तव में किशोर उपाध्याय जैसे तमाम नेता पहाड़ मैदान वाद को हवा दे रहे हैं।

किशोर उपाध्याय
उत्तराखंड बनने से पूर्व पहाड़ मैदान के बारे में ज्यादातर कोई जानता भी नहीं था, लेकिन उत्तराखंड बनते समय हरिद्वार के नेता अम्बरीष कुमार ने काफी प्रयास किया था की हरिद्वार को उत्तराखंड में ना मिलया जाए, क्योंकि मैदान की संस्कृति व भाषा पर्वतीय मूल के लोगों की संस्कृति व भाषा में काफी भिन्नता है। इसलिए इस हरिद्वार को उत्तराखंड में जाने से रोका जाए

स्वर्गीय अम्बरीष कुमार
अम्बरीष की उत्तराखंड बनते समय किसी ने नही सुनी थी।
उस समय अम्बरीष कुमार की किसी ने नहीं सुनी कारण यह था की छुट भैय्ये नेता बड़े नेता बनकर मंत्री बनने के ख्वाब देख रहे थे। और उनके ख्वाब पूरे भी हुए हैं , केवल ख्वाब ही पूरे नहीं हुए हैं, यह छुट भैय्ये मालामाल भी खूब हुए हैं, लेकिन अब पर्वतीय मूल के किशोर उपाध्याय ने खुलकर कहना शुरू कर दिया है की मैदान में रहने वालों का पानी बंद कर देंगे,

विनोद चमोली
किशोर उपाध्याय पहले खुद तो पानी पी लें, मैदान का पानी तो बाद में बंद करेंगे।
किशोर उपाध्याय पहले खुद तो पानी पी ले, तब तो मैदान का पानी बंद करेंगे । विधानसभा में भी हरिद्वार की ज्वालापुर सीट से कांग्रेस के विधायक रवि बहादुर व विनोद चमोली पर्वतीय विधायक के बीच काफी कहा सुनी हुई ।इस पर्वतीय विधायक का ड्रामा मैदानी विधायक को रास नहीं आया तो उन्होंने विधानसभा में ही इसका खुलकर विरोध किया, लेकिन विधायक रवि बहादुर के बराबर में ही बैठी हरिद्वार ग्रामीण से विधायक अनुपमा रावत कुछ नहीं बोली । वह यह सब कुछ देखती रही,

रवि बहादुर
बसपा विधायक शहजाद ने मुँह खोला है, मुकर्रम ने भी कॉंग्रेस छोड़ी।
हरिद्वार के लक्शर से बसपा विधायक शहजाद ने जरूर इस मुद्दे पर आपत्ति की है, और पर्वतीय लोगों को सबक सिखाने की हरिद्वार के लोगों ने ठानी हैं।हरिद्वार के ही कोंग्रेसी नेता मुकर्रम ने भी कॉंग्रेस छोड़ दी है।

शहजाद, बीएसपी विधायक
हरिद्वार के बीजेपी नेताओं विधायकों ने चुप्पी साधी।
बीजेपी का कोई भी नेता या विधायक या पूर्व विधायक इस प्रकरण में मैदानी मूल के लोगों के साथ नहीं है ,बीजेपी के सारे विधायक पूर्व विधायको के होठ सिले हुए हैं। अब देखना यह है की आने वाले समय में मैदान व पर्वतीय क्षेत्र का यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनाव में क्या गुल खिलाता है,
सरकारी कर्मचारियों में तो मैदानी व पर्वतीय वाद की खाई काफी गहरी हो चुकी है।
चपरासी से लेकर हर बड़े कर्मचारियों के अंदर मैदानी और पर्वतीय वाद बहुत ही गहराई के साथ फैला हुआ है। पर्वतीय कर्मचारी हो या अधिकारी हो वह मैदानी कर्मचारियों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करते हैं। और हालात यह है कि यह पर्वतीय अधिकारी और कर्मचारी पर्वतीय क्षेत्र में काम करना नहीं चाहते हैं काम करने के लिए इन्हें मलाईदार मैदानी क्षेत्र ही चाहिए उसके लिए इन्हें चाहे कुछ भी करना पड़े ,

मुख्यमंत्री, पुष्कर धामी
पर्वतीय अधिकारी व कर्मचारी पहाड़ पर नही मैदान में पोस्टिंग चाहते है।
पर्वतीय कर्मचारी मैदान में ही काम करेंगे पहाड़ पर नहीं जाएंगे। इन पहाड़ी कर्मचारियों और अधिकारियों में इतना एका है, की यह पर्वतीय अधिकारी और कर्मचारियों के लिए जी जान लड़ा देते हैं ,जबकि मैदानी क्षेत्र के अधिकारी व कर्मचारी एकजुट कतई नहीं है, और ना वह भविष्य में कभी एकजुट होंगे।
लेकिन अब पानी शायद सर से ऊपर जाने लगा है। इसलिए मैदानी क्षेत्र के नेताओं और अधिकारियों को भी कुछ ना कुछ सोचने पर विवश होना ही पड़ेगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पर्वतीय क्षेत्र के लोग मैदानी लोगों की और अधिक दुर्दशा करने पर उतारू होंगे और कोई कुछ नहीं कर पाएगा।लेकिन सभी पर्वतीय एक स्वर में इनके साथ हो,ऐसा भी नही है।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मैदानी पर्वतीय वाद के पक्ष धर नही है।
