1 Apr 2026, Wed

वर्ल्ड योग फेस्टिवल-2025 में योग की विभिन्न शैलियों, आयुर्वेदिक चिकित्सा, प्राणायाम, ध्यान, कीर्तन, नृत्य, और शांति साधना का अनूठा संगम

ऋषिकेश
हेनली-ऑन-थेम्स, यूनाइटेड किंगडम, 6 अगस्त 2025। इंग्लैंड की सुंदर वादियों में स्थित हेनली शो ग्राउंड में आयोजित वर्ल्ड योग फेस्टिवल-2025 एक अनुपम आध्यात्मिक और योगिक उत्सव के रूप में संपन्न हुआ। इस महोत्सव में योग, वेदांत, आयुर्वेद, ध्यान, संगीत, मंत्र, साधना और सेवा के विविध आयामों को जीवंत किया गया।

इस दिव्य आयोजन में भारत की ओर से आध्यात्मिक प्रतिनिधित्व करते हुए डा साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अपने प्रज्ञापूर्ण, करुणामयी और सशक्त विचारों से वैश्विक साधकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। साध्वी जी ने योग के माध्यम से उपचार और आंतरिक शांति प्राप्त करना विषय पर अपने गहरे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि जब हम योग के माध्यम से अपने भीतर की पीड़ा को स्वीकारते हैं और उसे प्रेम में बदलते हैं, तभी सच्चा उपचार होता है। योग हमें भीतर से मुक्त करता है, और आत्मा के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार कराता है।

डा साध्वी जी ने सनातन धर्म, नारी शक्ति, सेवा, पर्यावरण संरक्षण विशेषकर मां गंगा के प्रति श्रद्धा और वैश्विक एकता के विषयों पर भी गूढ़ और प्रभावशाली उद्बोधन दिया। उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने भारत की सनातन चेतना, आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक वैश्विक संवाद के बीच एक पुल का कार्य किया।
अद्वैत वेदांत की ऊँचाइयों पर दिव्य मार्गदर्शन न्यूयॉर्क स्थित रामकृष्ण मिशन के इस प्रबुद्ध संत स्वामी सर्वप्रियानंद जी ने किया। उन्होंने तात्त्विक अद्वैत वेदांत व अष्टावक्र गीता की शिक्षाओं के माध्यम से योग जिज्ञासुओं को आत्मबोध की ओर उन्मुख किया। स्वामी जी की शांत, तर्कयुक्त और सरल शैली ने पश्चिमी एवं भारतीय साधकों को वेदांत की ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

उन्होंने कहा कि योग और अद्वैत वेदांत दोनों ही भारत की महान आध्यात्मिक परंपराएं हैं, जो आत्मबोध और मुक्ति की ओर ले जाती हैं। योग, विशेषकर पतंजलि योगसूत्र के अनुसार, मन को शुद्ध करने, इंद्रियों को नियंत्रित करने और चित्त को स्थिर करने की विधा है। योग का उद्देश्य है “चित्तवृत्ति निरोध”, अर्थात् मन की सारी हलचलों को शांत करना, जिससे साधक अपने सच्चे स्वरूप को जान सके।

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