लखनऊ।
नरेश गुप्ता
लखनऊ में हुई बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली में रिकॉर्ड तोड़ भीड़ देखकर मायावती भी दंग रह गई होंगी, इस भीड़ को देख जहां मायावती दंग रह गई होंगी, वहीं बीजेपी ,कांग्रेस और सपा को भी नए तरीके से सोचने पर विवश इसलिए कर दिया है की कही इतनी भीड़ को देखकर मायावती के मन में पुनः सत्ता सुख के स्वपन हिलोरे न लेने शुरू कर दे, यही हाल मायावती के खास सिपहसालार सतीश मिश्रा का भी हो सकता है। वह भी इस भीड़ को देखकर नई उधेड़बुन शुरू कर सकते हैं। लेकिन मायावती ने जिस तरीके से इस रैली में कांग्रेस और और सपा को नशाने पर लिया था, और बीजेपी का गुणगान किया, उसको देखकर लगता है की मायावती जल्दी से कोई कदम उठाने से पहले कई बार सोचेंगी,।
मायावती को बी जे पी की ,ई डी व तमाम एजेंसियों की तरफ भी निगाह रख कर ही कोई कदम उठाना होगा।मायावती 14 वर्ष से राजनीतिक वनवास भोग रही है।
मायावती के एक ओर कुंआ और एक तरफ खाई है, क्योकी बी जे पी की ई डी का भूत सीना ताने खड़ा हुआ है , मायावती विगत 14 वर्षों से राजनीतिक वनवास एक तरीके से भोग रही हैं ,वह केवल चुनाव में ही थोड़ा बहुत जो स्क्रिप्ट उनको लिखकर दे दी जाती है, उसी को पढ़ दिया करती हैं। इस बार भी लखनऊ की रैली पर विपक्षी दलों का कहना है की जो स्क्रिप्ट बी जे पी द्वारा लिखकर दे दी थी वही स्क्रिप्ट उन्होंने रैली को संबोधित करते हुए पढ़ दी है , अब बी जे पी को सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कही मायवती पुनः हाथी पर बैठ कर कोई विगुल न बजा दे ।

क्या मायावती व ओवैसी बी जे पी की B व C पार्टी।
विपक्षी दलों का तो यह भी कहना है की मायावती बीजेपी की B और ओवैसी C पार्टी है। मायावती का एक जमाना हुआ करता था, जब वह आईएएस ,आईपीएस अधिकारियों से तू तड़ाक से बात करने में और अपने ही दल के विधायको और मंत्रियों को भी नीचे बैठाने में अपनी शान समझती थी।
मायावती के जन्मदिन पर महंगे तोहफे व नकद नरायन के साथ ही टिकटों की महंगी बोलियां लगती थी।
एक जमाना था जब मायावती के जन्मदिन पर उनको उपहार देने वालों की लंबी फौज हुआ करती थी। इन उपहारो में मायावती को सोने, चांदी के मुकुट ,हीरे के सेट और तमाम तरह की नगदी प्रदान की जाया करती थी। कहा जाता है की टिकट बिक्री में भी मायावती का अपना अलग ही रुतबा था, अब पिछले 14 साल से ना तो कोई उनका टिकट लेने आ रहा है, और ना ही उनके जन्मदिन पर सोने चांदी और हीरे के उपहार उनको मिल रहे हैं ,तो यह भी उनको कचोटता तो अवश्य होगा।

मायावती की चाहत बी जे पी के रहते नही चढ़ रही है परवान ।
मायावती की चाहती तो होगी की वे सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाएं, लेकिन मायावती के पास जो अकूत संपदा है ,जो उन्होंने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए एकत्र की है यदि उस संपत्ति का उन होटलों का उन प्लॉटों का उन कोठियों का हिसाब मायावती से मोदी जी की E D लेने लगी तो मायावती के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जायेंगी ,इसीलिए मायावती ने अपने होठों पर टेप लगा रखी है। वह बिल्कुल नहीं बोलती है। और बीजेपी के खिलाफ तो उनके मुंह से अब एक शब्द भी नहीं निकलता है ।यह हाल तो तब है जब बीजेपी के शासन में कई आई ए एस व आई पी एस अधिकारी अपने को प्रताड़ित होने की बात कहने के साथ-साथ कई दलित कन्याओं और पुरुषों की हत्याएं भी हो चुकी हैं। लेकिन उसके बावजूद मायावती के मुंह से बी जे पी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं निकला।
दलितों का नेता बनने की चाहत में चन्द्रशेखर ,लेकिन मायावती के जलवे तक पहुंचा नामुमकिन।
मायावती का स्थान ग्रहण करने के लिए उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर के नगीना लोकसभा क्षेत्र से सांसद चंद्रशेखर दलितों के मसीहा बनकर उभरने का प्रयास तो कर रहे हैं। लेकिन मायावती का मुकाबला करना उनके बस में नहीं है, संसद तक वे पहुंच गए हैं, इसके आगे संभवत कोई पद उन्हें कभी हासिल हो यह तो कह पाना मुश्किल है।फिर भी राजनीति में सब कुछ संभव है ,कब कौन कहां किस पद पर पहुंच जाए कैसे पहुंच जाए कुछ कहा नही जा सकता।

काशीराम ने बनाया मायावती को दलितों का मसीहा, दलितों के मतों के नाम पर खूब चली मायावती की दुकान।
मायावती को ही ले लीजिएगा मायावती एक सामान्य परिवार से रही है ।उन्होंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि वह कभी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ इस तरीके से राज करेंगीं के आने वाले कई सौ वर्षो तक उनका नाम इतिहास के पन्नों पर अमर हो जाएगा। मायावती काशीराम जी की शिष्य कही जाती है ।और इसमें कोई शंका भी नहीं है के वे काशीराम जी की शिष्य नहीं है। काशीराम जी ने ही उनको राजनीति की A B C D सिखाई है। और राजनीति की सीढ़ी पर उन्हें इस कदर ऊपर तक पहुंचा दिया की अब वह उस सीढ़ी से नीचे उतरते हुए उन्हें थोड़ा कष्ट तो होता ही होगा।
बड़े बुजुर्गों की कहावत है की गुरु गुण और चेला चीनी तो यहां काशीराम जी ने कोई चेला तो नहीं बनाया था। लेकिन शिष्य के रूप में काशीराम जी ने मायावती जी के सिर पर जरूर हाथ रखा था। और उन्होंने अपनी शिष्य को इतना कामयाब कर दिया है की वह आने वाले समय में चाहे तो देश की राजनीति पर अपना नाम और अधिक रोशन कर सकती है। लेकिन उन्हें केवल और केवल बीजेपी की E D और तमाम एजेंसियों से ही डर लगता है ।इसीलिए वह खामोश रहती हैं। अन्यथा मायावती को खामोश रहने की आदत नहीं है, वह अकारण केवल दलित वोट समेटे रहने के लिए उच्च जाति के लोगों को गरियाती रही हैं। तिलक, तराजू और तलवार जूते मारो इनको चार यह मायावती का पेटेंट दोहा रहा है।

जब मायावती की नैय्या के खेवनहार पंडित जी,सतीश मिश्रा जी बन गए ।
समय-समय की बात है , तिलक वाले सतीश मिश्रा जी काफी समय से उनके काफी निकट के सलाहकार बने हुए हैं। भले ही मिश्रा जी तिलक ना लगाते हो लेकिन जाति से तो ब्राह्मण ही है। अब देखना यह है, की मायावती की यह जो रैली हुई है इसके बाद मायावती का अगला कदम क्या होता है ।वह हमेशा की तरह चुपचाप होकर अपने महल में विराजमान रहेगी, या थोड़ी बहुत राजनीति की पटरी पर आगे बढ़ने का प्रयास भी करेंगी। विपक्षी दलों का तो यह कहना है की लखनऊ की सभा मे यह भीड़ मायावती ने खुद नहीं बुलाई थी, इस भीड़ को बुलाने के लिए बीजेपी ने भी मायावती को अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया था।

उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से भीड़ लाने के लिए सरकारी वाहन उपलब्ध कराए जाने के साथ-साथ भोजन की व्यवस्था भी भीड़ में आने वाले लोगों के लिए की गई थी, और विपक्ष की इन बातों में थोड़ा दम भी दिखाई देता है। क्योंकि मायावती जी ऐसी नेता हैं, जिन्होंने कभी अपनी जेब से एक रु भी खर्च नहीं किया है। पहले भी खर्चा उनकी पार्टी के मंत्री , नेता और जाति के दलित शीर्ष अधिकारी किया करते थे। लेकिन अब ना तो पार्टी के नेता बचे हैं और ना ही पार्टी के वह मंत्री हैं जिन्हें यह उम्मीद हो कि जो खर्चा करेंगे ,वह दुगना या चौगुना होकर वापस मिल जाएगा इसलिए विपक्ष की इन बातों में थोड़ी सत्यता नजर आती है।

