हरिद्वार। जनपद में स्थापित अनगिनत फार्मा कंपनियो में जो दवाइयां बन रही हैं उन फार्मा कंपनियों में से अधिकांश की दवाइयां मानकों के आधार पर खरी नहीं है इस बात को पिछले 6 महीने से लिखा जा रहा है ।साथ ही इन फार्मा कंपनियों में सब स्टैंडर्ड दवाइयां भी बन रही है जो यहां से बनने के बाद दिल्ली जाती हैं और दिल्ली से लौटकर फिर उत्तराखंड आ जाती है। यहाँ ये धडल्ले से बेची जाती है।
कई फार्मा कंपनियों में नशीले कैप्सूल नशीले इंजेक्शन नशीली दवाइयां भी विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से बन रही है और बाजार में बिक रही है लेकिन इन फार्मा कंपनियों पर हाथ डालने की हिम्मत न तो ड्रग विभाग कर पाता है और न ही देहरादून व दिल्ली में बैठे अधिकारियों को इनकी तरफ देखने की फुर्सत है अभी हाल ही में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने हरिद्वार की 15 फार्मा कंपनियां की दवाओं के सैंपलों की जांच कराई तो इनमें से अधिकांश की दवाइयां मानकों के आधार पर खरी नहीं उतरी है।

लेकिन इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि इन फार्मा कंपनियों की पहुंच काफी ऊपर तक है और काफी ऊपर तक क्या कहा जाए । इनकी पहुंच दिल्ली तक है। जिस कारण यह सब तरीके की नशीली दवाइयां बना रहे हैं और बेच रहे है।
हरिद्वार जनपद की कुछ इक्का-दुक्का फार्मा कंपनी पर जिनमें से किसी के पास ना तो दवा बनाने का लाइसेंस था और किसी का लाइसेंस रिन्यू नहीं हुआ था उनपर छापेमारी कर खाना पूर्ति करने से ज़्यादा कुछ नही हुआ है। लेकिन फिर भी वह निर्भीक होकर नशीली दवाएं बना रहे है ।

दो फार्मा कंपनियों को हरिद्वार ड्रग विभाग ने छापा मार कर पकड़ा था लेकिन उनके खिलाफ भी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है। जिसके बाद वह फिर अपने काम में लग गई है। यह जो दवाइयां फार्मा कंपनियों में से निकल कर आ रही है यह सीधे ग्रामीण क्षेत्र के मेडिकल स्टोर पर और शहर के कई मेडिकल स्टरों पर बेची जाती है। अधिकांश की तो बात छोड़िए हरिद्वार के सभी मेडिकल स्टोर वाले दवा की कोई बिलिंग नहीं करते हैं कस्टमर को दवा खरीदने के बाद किसी तरीके का कोई बिल नहीं दिया जाता है ।
क्या दवाई दी जा रही है क्या लिखी है पर्चे में कोई पूछने वाला नहीं है अगर इसकी शिकायत की भी जाय तो जवाब मिलता है ।हम देखेंगे, देख रहे हैं और जांच करेंगे इससे आगे मामला बढ़ता ही नहीं है। क्योंकि फार्मा कंपनियों से और मेडिकल स्टोर वालों से ड्रग विभाग को नीचे से लेकर ऊपर तक मोटी आमदनी होती है। इस कमाई के चक्कर में मरीज और मरीज के तीमारदार पीस रहे हैं।

मरीज इन दवाओ के सेवन से समय से पहले ही स्वर्ग सिधार रहा है लेकिन इन धन के लोभियों को मानवता नाम की तो कोई चीज छूकर भी नहीं गई है। इनको केवल चाहिए तो पैसा चाहिए जो इन्हें हर हाल में किसी भी सूरत में पैदा करना है ।कोई मरे इनकी बला से जिए तो इनकी बला से इनको तो केवल और केवल पैसे से मतलब है।
इनके ऊपर किसी तरीके का ना तो कोई अंकुश है ना इनके ऊपर कोई हाथ डालता है क्योंकि यह नीचे से लेकर ऊपर तक सबको संतुष्ट करके रखते हैं सभी को औकात के हिसाब से दक्षिना प्रदान की जाती है।जिसकी एवज में ये निर्भीक और निर्विघ्न रूप से अपना कारोबार चलाते है । और धडल्ले से 9 के 100 करते है।

