12 Feb 2026, Thu

संत परम्परा को अपनाना व संन्यास लेना कोई बच्चों का खेल नहीं ,तलवार की धार पर चलना पड़ता है, गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले संत को।

हरिद्वार। आजकल देखने को मिल रहा है की साधु संत बनने के लिए पुरुष ही नहीं महिलाओं में भी एक तरह की होड सी लगी हुई है। लेकिन साधु बन्ना संत परम्परा का निर्वहन करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। संत बनने के लिए व गेरुआ वस्त्र धारण कर सन्यासी बनने के लिए लोहे के चने चबाने के साथ-साथ तलवार की धार पर भी चलना पड़ता है।सन्त बनने की प्रथम सीढ़ी से लेकर आख़िर तक बड़े ही कठिन दौर से गुजरना पड़ता है।

संत बनने की प्रथम सीढ़ी है ब्रह्म ऋषि बन्ना ब्रह्म ऋषि को पहले दीक्षा महापुरुष की प्रदान की जाती है, उसके बाद रुद्राक्ष, लंगोटी, भगवा वस्त्र, शिखा छेदन व नामकरण किया जाता है । इन पांचो में शिखा छेदन व नामकरण ब्रह्म ऋषि का गुरु ही करता है। उसके बाद कुंभ मेले में इस संत का विजया होम होता है। कुंभ मेले में होने वाले संस्कार को विजया होम कहा जाता है। जिसमें शिखा को छोड़कर मुंडन होता है। पूरे शरीर के बाल भी काटे जाते हैं, सफेद वस्त्र, जनेऊ, दंड, पूर्ण मन्त्रो के द्वारा हवन होता है। उसके बाद गंगा किनारे संकल्प दिलाया जाता है

अपना खुद का पिंड दान भी करना होता है

फिर पिंडदान की परंपरा है पिंडदान के बाद गुरु आचार्य प्रेस मंत्र देते हैं, फिर संपूर्ण चीजों का त्याग कराया जाता है ।लेकिन लोकाचार के कारण भगवा वस्त्र धारण करने की अनुमति प्रदान की जाती है, जिसे दिगंबर दीक्षा कहा जाता है ।और यह कार्य वही गुरु कराता है जिसका शिष्य दीक्षा ले रहा हो, नागा संत बनने के लिए व्यक्ति के लिंग की नशे कुशल गुरुओं के द्वारा झटका देकर तोड़ दी जाती है, जिससे नागा बनने वाले सन्त में काम वासना जाग्रत न हो।

अब नागा बनाये जाने की परम्परा लगभग समाप्त हो गई है, नागा बनाने की प्रक्रिया में व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाने का खतरा रहता है।

नागा साधु बनने की जो प्रक्रिया है ,उसमें शिष्य के लिंग की नसों को एक झटके के साथ किसी कुशल गुरु के द्वारा ही तोड़ दिया जाता है, जिससे उसके अंदर कभी भी वासना जागृत न हो, लेकिन अब इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया जाता, क्योंकि इस प्रक्रिया को करने वाले गुरु बहुत कम रह गए हैं। इसलिए इस प्रक्रिया को करने से व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाने का खतरा रहता है ।इसलिए अब पूरे विश्व के अंदर नागा साधुओं की संख्या एक तरीके से न के बराबर ही है।

नागा अब ढूंढे से भी नही मिलते,कुंभ की पेशवाईयो में निकाले जाने वाले नागा,80 प्रतिशत फर्जी होते है

यदि पूरे विश्व में नागा साधुओ की गिनती की जाय तो उंगलियों पर गिने जाने वाले नागा साधु ही अब इस दुनिया में बचे हैं ,बाकी जो अपने आप को नागा बताते हैं ,या जो अखाड़ों के नेता अपने आप को नागा बताते हैं, वह सब बातें झूठी है, किसी भी अखाड़े में 10 से अधिक नागा बामुश्किल मिलेंगे ।

महिला साध्वी बनाने की पूरी प्रक्रिया महिला गुरु ही कराती है।पुरुषों को कराने का अधिकार नही।

यही प्रक्रिया महिला संतों के साथ भी अपनाई जाती है। और महिला संतों की जो दीक्षा और विजया होम होता है, वह महिला संत ही कराती हैं, वह पुरुषों को कराने का अधिकार नहीं है।

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