देहरादून।
दर्जाधारी राज्य मंत्रियों की फौज में से कोई भी नहीं है दर्जा धारी राज्य मंत्री, इनको विभागों का सलाहकार ,अध्यक्ष , उपाध्यक्ष व सदस्य नियुक्त किया जाता हैं। इनको दर्जाधारी राज्य मंत्री का नाम दिए जाने का कोई भी G O राज्य सरकारों के पास नहीं है।
इस तरह की नियुक्तियों की शुरुआत उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण तिवारी जी ने जोर शोर से शुरू की थी, जो आज तक चली आ रही है, राज्य में कुछ ऐसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को इन पदों से नवाजा जाता है जिनकी पार्टी के प्रति निष्ठा व लगन होती है, ऐसे नेताओं को व मुख्यमंत्री अपने चहेतों या पसंदीदा कार्यकर्ताओं को भी किसी भी विभाग का सलाहकार अध्यक्ष , उपाध्यक्ष नियुक्त कर देते है।
ये सलाहकार महोदय अपने को दर्जाधारी राज्य मंत्री घोषित कर लेते है, जबकि सरकारी G O में दर्जाधारी राज्य मंत्री का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन यह दर्जाधारी राज्य मंत्री अपने आप को विभाग का सलाहकार ,अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बताते हैं यह सीधे-सीधे दर्जाधारी भी नहीं बताते हैं राज्य मंत्री बताते हैं।

यह वे राज्य मंत्री हैं जिनमें से अधिकांश तो ऐसे हैं अगर यह अपने क्षेत्र में नगर निगम के पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए खड़े हो जाएं तो इन्हें 100 वोट नहीं मिलेंगे लेकिन किसी की सिफारिश पर या और किसी तरीके से गुणा भाग लगाकर यह पद पा जाते हैं।
सरकार से इन्हें मानदेय के रूप मे 45 हजार रु प्रति माह मिलता है , साथ ही गाड़ी , ऑफिस आवास एक निजी सहाय जिसका मानदेय 15 हजार रुपए प्रति माह व एक अनुसेवक जिसका मानदेय 12 हजार रु प्रति माह होता है , यदि कोइ ऑफिस व आवास अपने आप लेना चाहे तो सरकार ऐसे नेता जी को 25 हजार रु महीना अलग से देती है।
यदि गाड़ी भी नेता जी खुद लेते हैं तो गाड़ी ड्राइवर व तेल के लिए 45 हजार रु महीना सरकार देती है, कुल मिलाकर एक लाख पचास हजार रु प्रति माह नेता जी पर सरकार खर्च करती है । ये जनता से कई प्रकार के टेक्सों के रूप में वसूली गई धनराशी ही होती है जो नेताओं पर राज्य सरकार खर्च करती है।
वैसे तो सभी राज्यों में इस तरह की परम्परा है लेकिन कही ज्यादा कही कम हो सकती है।
इन पदों पर नियुक्तियों की परंपरा में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी जी ने ज्यादा तेजी दिखाई थी, पंडित नारायण दत्त तिवारी जी को ही नहीं पता था कि वह अपने कार्यकाल में कितने कार्यकर्ताओं को चिट्ठियां बांट चुके हैं।

अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष की चिट्ठी मिलते ही इन मान्यवारों की गाड़ियों पर लाल बत्ती फिट हो जाती थी, और गाड़ियों में टू टू करने वाले हॉर्न बजाने का लाइसेंस भी मिल जाता था।
लेकिन अब लाल बत्ती लगाने का तो रिवाज खत्म हो गया है, उस समय एक बार मैंने स्वर्गीय तिवारी जी से उनके हरिद्वार दौरे के समय पूछ लिया था, की तिवारी जी आपने इस कदर लाल बत्तियां बांट दी हैं कि अब तो जमीन पर बैठकर चूड़ी और सिंदूर बेचने वाला भी अपने को राज्य मंत्री बताता है , स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी जी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझसे कहा था । उस समय और भी कई पत्रकार थे कई अधिकारी थे कई नेता थे, तब तिवारी जी ने कहा था यह लाल बत्तियां तो ट्रकों पर भी लगी रहती हैं।

मैने फिर पूछा तो क्या इन लाल बत्तियों को ट्रकों पर लगी हुई बत्ती समझा जाए , इस पर स्वर्गीय पंडित नारायण दत्त तिवारी मुस्कुराए थे, उनको हाथ पकड़ कर चलने की आदत थी उस समय उन्होंने मेरा भी हाथ पकड़ा हुआ था फिर उन्होंने मेरा हाथ भी दबाया था।
यह परंपरा तब से कुछ ज्यादा चली आ रही है लेकिन राज्य सरकार में इस तरीके का कोई प्रावधान नहीं है कि किसी को भी दर्जाधारी राज्य मंत्री बनाया जाए। लेकिन चिट्ठी प्राप्त करने मे कामयाब हो जाने वाले सलाहकार ,अध्यक्ष , उपाध्यक्ष विभाग का सलाहकार नही लिखते हैं, अपने आप को सीधे राज्य मंत्री लिखते हैं।
ये जीवन भर राज्य मंत्री बने रहते, इनका नाम सुनकर नई पीढ़ी ये सोचने पर मजबूर हो जाती है की यह कब राज्य मंत्री थे, ये तो कभी चुनाव भी नहीं जीते जिसे देखो राज्य मंत्री जिसे देखो राज्य मंत्री ये दर्जाधारी राज्य मंत्री अपने बाकायदा स्वागत सत्कार कराने में व्यस्त रहते हैं।
और सबसे बढ़िया एक लाइसेंस इनको यह मिल जाता है कि जब भी मुख्यमंत्री शहर में आए तो सबसे पहले मुख्यमंत्री के बराबर में खड़े होकर फोटो खिंचवाओ और तुरंत फोटो फेसबुक पर या व्हाट्सएप पर पोस्ट कर दो की जिससे अधिकारी समझ ले की इस नेता की पहुंच तो सीधे मुख्यमंत्री तक है, तो इतना भर काम इन राज्य मंत्रियों का होता है।
किसी भी विभाग की किसी फाइल को देख कर लिखित आदेश देने का इन्हें कोई अधिकार नहीं है , मौखिक सलाह तो यह दे सकते हैं ,लेकिन इनके मौखिक आदेशों का कोई पालन होता भी है या नहीं इसकी जानकारी तो इन मंत्रियों को ही होगी ।

