हरिद्वार।
जब रिश्ते सिर्फ “फॉर्मेलिटी” बनते जा रहे हैं और संतान अपने बुज़ुर्ग माता-पिता को बोझ समझने लगी है, ऐसे स्वार्थी युग में एक बेटे ने श्रवण कुमार की परंपरा को जीवंत कर दिया है।
अलीगढ़ के बिलखोरा गांव निवासी संजू ने न सिर्फ भगवान शिव केअर्पित करने के लिए हरिद्वार से गंगाजल से भरी कांवड़ उठाई है, बल्कि उसी कांवर में अपने जीवन की देवी — अपनी मां श्रीमती पुष्पा देवी को भी बिठाया है।
यह यात्रा महज़ भक्ति नहीं, बल्कि संस्कार, समर्पण और सेवा का ऐसा जीवंत उदाहरण है जो आज की पीढ़ी के लिए आईना बन सकती है।


“संजू का कहना है की आज के दौर में लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं… जबकि असली मंदिर तो मां-बाप के चरणों में है। मैं यही चाहता हूं कि लोग समझें — जो मां को कांवड़ में नहीं बिठा सकते,माँ की सेवा नही कर सकते वो मंदिर में क्या कर पाएंगे?”
“दूधों नहाओ, पूतों फलों…” — मां के आशीर्वाद में छलका आभार
पूरे रास्ते संजू की मां पुष्पा देवी, कांवड़ में बैठकर भगवान शिव का नाम जपती जा रही थीं। जब उनसे पूछा गया कि कैसा लग रहा है इस यात्रा पर बेटे के साथ, तो उनकी आंखें नम थीं, और कांपती आवाज़ में बस एक ही बात निकली —
“ऐसा बेटा सबको मिले। मेरी तो हर सांस में अब भगवान नहीं, मेरा बेटा है। मैं प्रार्थना करती हूं कि जैसे ये मेरी सेवा कर रहा है, वैसी ही सेवा इसके बच्चे भी इसे करें।”
हर पड़ाव पर वह बेटे के माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देतीं — “सदा सुखी रहो… सदा स्वस्थ रहो बेटा… तुमने मेरा जीवन सफल कर दिया।”कलयुग में जिंदा है सतयुग की आत्म
संजू के अनुसार “मंदिर तो हजारों हैं, लेकिन मेरे लिए मेरे माता-पिता ही मंदिर हैं। गंगाजल से भगवान का अभिषेक तो बहुत लोग करते हैं, पर मेरी भक्ति उस मां की सेवा है, जिसने मुझे जीवन दिया।”

यह सिर्फ यात्रा नहीं — यह युग परिवर्तन है। यह पुकार है हर उस बेटे के लिए जो अपने माता-पिता को भूल गया है।
हरिद्वार से अलीगढ़ तक यह 300 किलोमीटर की पदयात्रा सिर्फ पैरों की नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संस्कारों और श्रद्धा की यात्रा है। जब दुनिया आधुनिकता के नाम पर रिश्तों को त्याग रही है, तब संजू जैसे बेटे इस बात की गवाही हैं की कलयुग में भी भारत की आत्मा आज भी जीवित है।

