रामेश्वर गौड़ ।
कला की कोई जाति नहीं होती! हरिद्वार में सनातन धर्मार्थियों की आस्था के प्रतीक ‘ॐ’ में पूर्ण तन्मयता से रंगों से खूबसूरती उकेरता मुस्लिम कलाकार , 2027 के कुंभ के लिए हरिद्वार को सजाया संवारा जा रहा है।
हरिद्वार में डाम कोठी के पास पुल पर मुस्लिम कलाकार ने जब ‘ॐ’ को केसरिया रंग से सजाया तो आम जनमानस इस कलाकार की कला को देख अचम्भित रह गए ,
धर्म की राजधानी तीर्थ नगरी हरिद्वार में कुंभ-2027 की तैयारियां धीरे-धीरे रंग पकड़ने लगी हैं। सड़कों, दीवारों और सार्वजनिक स्थलों पर तैयारियों के बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने न केवल मन को आकर्षित किया बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि क्या कला का भी वास्तव में कोई जाति और कोई धर्म होता है ?
सुबह घर से निकला तो डाम कोठी से कुछ पहले एक पुल पर नजर ठिठक गई। वहां एक दाढ़ी व टोपी वाले मुस्लिम कलाकार भाई बड़े आकार में बनाए गए ‘ॐ’ के स्वरूप में बेहद बारीकी से रंग भरते दिखाई दिए, जिसे देख कर लगा की कला सांप्रदायिक सौहार्द की जीती जागती मिशाल है।
कलाकार अपने काम में इस कदर डूबा हुआ था कि कुछ क्षणों के लिए रुकता, रंगों को देखता, फिर सोच-समझकर ब्रश चलाता। उसके हाथों में रंग थे और सामने था सनातन धर्म का पवित्र प्रतीक ‘ॐ’।
यह दृश्य इतना मनमोहक था कि कैमरा निकालना पड़ा और उस पल को तस्वीर में कैद कर लिया।
चेहरा कुछ और कह रहा था, कला कुछ और
कलाकार को देखकर पहली नजर में शायद किसी के मन में जाति या धर्म का सवाल आ सकता था, लेकिन जब उसकी कला को देखा तो ये सारे सवाल छोटे लगने लगे, वह एक कलाकार था।
और कलाकार की पहचान उसके हुनर, मेहनत और उसकी बनाई कलाकृति से होती है।
उसके लिए सामने बनी आकृति एक ऐसा कैनवास थी, जिसे उसे अपने रंगों से सुंदर बनाना था। वह बार-बार रुककर रंग देखता, फिर ब्रश चलाता और ‘ॐ’ को और अधिक आकर्षक बनाने में जुट जाता।
उसके हाथों में रंग थे, सामने सनातन का प्रतीक था और मन में केवल अपनी कला को बेहतर बनाने का प्रयास।
कुंभ की सबसे खूबसूरत तस्वीर शायद यही है
कुंभ केवल साधु-संतों, अखाड़ों और श्रद्धालुओं का आयोजन नहीं है। यह ऐसा विशाल धार्मिक आयोजन है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी-अपनी प्रतिभा, सेवा और हुनर के साथ जुड़ते हैं।
कोई घाट सजाता है,
कोई चित्र बनाता है,
कोई मूर्ति गढ़ता है,
कोई सड़क सजाता है,
कोई व्यवस्था संभालता है
और कोई अपनी कला से धर्मनगरी को नया रूप देता है।
हर हाथ की अपनी भूमिका है और हर हुनर कुंभ की भव्यता में अपना रंग भरता है।
यही कारण है कि डाम कोठी के पास ‘ॐ’ को रंगते उस कलाकार का दृश्य सामान्य होते हुए भी असाधारण लगा।

कला को जाति से नहीं, हुनर से पहचानिए
हम अक्सर कलाकार की पहचान उसके नाम, धर्म या जाति से करने लगते हैं। लेकिन कला की अपनी कोई जाति नहीं होती।
रंग किसी धर्म के नहीं होते।
ब्रश किसी जाति का नहीं होता।
कैनवास किसी मजहब का नहीं होता।
कला केवल सुंदरता पैदा करना जानती है।
जिस कलाकार को जहां काम मिलता है, वह अपने हुनर से उसे बेहतर बनाने में जुट जाता है। उसके हाथ में जब ब्रश आता है तो उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका हुनर होता है।
और शायद यही बात इस कलाकार ने बिना कुछ कहे समझा दी।
जिस ‘ॐ’ को कलाकार रंगों से सजा रहा था, वह केवल एक आकृति नहीं थी। वह सनातन परंपरा के एक पवित्र प्रतीक को अपनी कला के माध्यम से सुंदर बनाने का प्रयास था। उसे देखकर लगा कि कुंभ की तैयारियों में हर व्यक्ति अपनी-अपनी आहुति दे रहा है।
कोई श्रम की आहुति दे रहा है, कोई सेवा की, कोई व्यवस्था की, कोई कला की और कोई अपनी प्रतिभा की। जब ये सभी रंग एक साथ मिलेंगे, तभी हरिद्वार का कुंभ दिव्य और भव्य स्वरूप लेगा।
कुंभ हमें यही तो सिखाता है—भिन्नता के रंग अलग हो सकते हैं, लेकिन जब वे एक साथ मिलते हैं तो तस्वीर और भी सुंदर बनती है।

