उत्तराखंड। समय परिवर्तन शील है।जैसे जैसे समय बदलता है। वैसे वैसेसभी परम्पराओ में भी परिवर्तन आना स्वभाविक है।वर्तमान देश के कर्णधार राजनेताओं की अब सूरत व सीरत ही बदल गई है। पहले राजनेताओं व अधिकारियों में शर्म हया हुआ करती थी । अपने मान सम्मान से किसी तरह का समझौता नही करते थे।लेकिन अब तो नेताओं व बीयूरोक्रेट्स के रंग रुप ही बदल गए है। अब हालात ये है की जिसने करी शर्म उसके फूटे कर्म वाली परम्परा का निर्वहन खुलकर हो रहा है। पहले राजनेताओं को अगर उनकी कमियों के बारे में सरेआम भी बताया जाता था चाहे उसमें मुख्यमंत्री ही क्यों ना हो। तो वह कमी सार्वजनिक रूप से सुनकर उनको थोड़ी देर के लिए तो परेशानी होती थी। लेकिन फिर वह उस पर चिंतन मनन करते थे ।अधिकारियों से बैठकर वार्ता करते थे । और उन कमियों को दूर किया करते थे। लेकिन अब अगर आपने मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ी बात है अगर किसी विधायक के बारे में भी कुछ कह दिया तो वह भी आपके ऊपर अपनी लुंगी , पजामा लेकर दौड़ेगा क्योंकि इस समय सब बेहद ईमानदार और हरिश्चंद्र के पोते हैं ।
लेकिन लक्ष्मी के पुजारी हैं कुछ भी हो किसी तरीके से भी हो केवल लक्ष्मी चाहिए। लक्ष्मी की आराधना से ही कल्याण होगा लक्ष्मी की आराधना से ही कुर्सी बची रहेगी और यह कुर्सी चाहे राजनेता की हो चाहे अधिकारी की हो और चाहे हमारे लेखक भाइयों की हो लक्ष्मी की कृपा है तो सब की कृपा है ।अन्यथा सब सूना है ।ऐसा नहीं की आज भी सभी लोग लक्ष्मी के पुजारी हैं । राजनेता हो या पत्रकार कुछ ने अपने जमीर को नही बेचा है।लेकिन उनकी तरफ कोई गौर करने वाला या उनको कोई महत्व देने वाला इस युग में नहीं दिखाई पड़ता।उत्तराखंड मे गिनती के दो ब्यूरोक्रेट्स है जो पीसीएस से प्रमोशन पाकर आईएस बने है ।इन दोनों की ही बल्ले बल्ले है ।ये ही पूरी सरकार चला रहे है।रही बात लक्ष्मी माता की सो इन अधिकारियों पर माँ की अशीम कृपा है ।इस राज्य के राजनेता तो सोने की चम्मच मुँह में लेकर जन्मे है कब किसकी लॉटरी हाई कमान की कृपा से लग जाय कहना मुश्किल है ।
उत्तराखंड के जन्म के बाद पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी थे।जिनको इस राज्य के नेताओ ने काम ही नही करने दिया।भगत सिंह कोश्यारी भी कुछ नही कर पाए।फिर रमेश पोखरियाल निशंक जी को मौका मिला तो हरिद्वार के विधायक व राज्य में मुख्यमंत्री के बाद दूसरे नम्बर की हैशियत रखने वाले मदन कौशिक एक साथ मिलकर काम कर रहे थे।लेकिन कुंभ 2010 के मेले के बाद दोनों की राहें जुदा हो गई।उसके बाद निशंक जी के सबसे विश्वास पात्र हरिद्वार के ही ओम प्रकाश जमदग्नि हो गए जो आज तक बने हुए है।कोंग्रेस की हरीश रावत सरकार में रंजीत रावत की चलती थी तो विजय बहुगुणा की सरकार में उनके पुत्र के हाथ मे बागडोर थी।खंडूरी जी की सरकार में उमेश अग्रवाल की खूब चली।तिरवेंद सिंह रावत की सरकार में फिर मदन कौशिक की बल्ले बल्ले हो गई।
अब राज्य के युवा विधायक पुष्कर धामी जिनको राजनीति में भगत सिंह कोश्यारी का शिष्य माना जाता है।युवा होते हुए भी पुष्कर धामी राजनीतिक शतरंजी चालों के कुशल खिलाड़ी की तरह कुशलता पूर्वक सरकार चला रहे है। अपने तीन वर्ष के कार्य काल मे कार्यक्रमों में बैडमिंटन खेलना, साइकिल चलाना , कबड्डी खेलना , होकी खेलना , क्रकेट खेलना व जनसभा में मौजूद छोटे बच्चों को गोदी में लेकर खिलाने लगना ये राजनीतिक के कुछ ऐसे पैंतरे है जो सीधे जनता से नेता को जोड़ते है। यही कारण है ।की धामी सरकार में काफी कमियाँ होते हुए भी वे खुद जनता के बीच लोकप्रिय है।पंडित नारायण दत्त तिवारी जी की सरकार में आरेन्द्र शर्मा सर्वे सर्वा हुआ करते थे।लेकिन इस राज्य में एक बात तो बहुत अच्छी है।मुख्यमंत्री चाहे कोंग्रेस के रहे हो या बीजेपी के जिन्होंने जितना कमाया उस पर कोई उंगली नही उठता।कमाओ,खाओ और मौज लो की नीति पर राज्य चल रहा है। वर्तमान में उत्तराखंड सरकार के मंत्री तो खुल कर खेल करते है।सीधे बात करते।कोई डर भय नही।मंत्रियों की ये करतुते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को न पता हो ऐसा हो नही सकता। लेकिन मुख्यमंत्री सबकुछ देखते समझते चुप्पी साधे हुए है|

