22 Jul 2026, Wed

मंदिरों में ही दान की धनराशि में से चोरी नहीं होती है, यह काम देश की प्रसिद्ध दरगाहों में भी होता है

हरिद्वार

भारत वर्ष में कई दरगाह है जहां पर हिंदू मुसलमान दोनों ही मन्नत मांगने आते हैं, इन दरगाहों में भी धन की बंदर बांट और हेरा फेरी ,चोरी को लेकर आपस में ही आरोप प्रत्यारोप चलते रहते हैं ।

जो भी संस्था या पदाधिकारी इन दरगाहों में स्थापित हो जाते हैं वह वहां से हटने का नाम नहीं लेते हैं , इन दरगाहों पर वख्फ़ बोर्ड का नियंत्रण रहता है।

हरिद्वार जनपद के रुड़की के ग्राम कलियर में स्थित दरगाह साबिर पाक पूरे देश नहीं विदेशों में भी अपनी पहचान रखती है। यहां देश-विदेश से जायरीन ज्यारत के लिए आते हैं।

और साबिर पाक से दुआएं करते हैं की साबिर पाक उनके कष्टों को दूर करें और देश में भी अमन चैन बना रहे , यहां पर ज्यारत करने आने वाले लोग दिल खोलकर धनराशि भी चढ़ाते हैं।

जायरीनों से लंगर और कई अन्य तरीके से पैसा ले लिया जाता हैं , साथ ही जो लोग बाहर घूमते रहते हैं ,या दरगाह शरीफ में रहते हैं, वह भी जायरीनों की जेबें हल्की करने के तमाम गुण जानते हैं ।

सबसे मुख्य काम दरगाह शरीफ पर उस समय होता है, जहां साबिर साहब की दरगाह है, वहां पर दरगाह के ऊपर चढ़ाई गई चादर को अकीदत मन्दों के सर पर चादर को स्पर्शकराने के लिए भी पैसे मांगे जाते हैं ।

दरगाह के चारों तरफ जो लोग अंदर रहते हैं , सभी लोगों को कुछ ना कुछ वहां चाहिए होता है।

यही हाल अजमेर शरीफ में भी है , यहां ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह है ,अजमेर शरीफ में भी दरगाह परिसर के अंदर जैसे ही प्रवेश करेंगे बहुत बड़ी डेक रखी हुई है, इस डेक में सप्ताह में एक दिन खाना बनता है , दरगाह अजमेर शरीफ में आने वाले जायरीन डेक पकने के लिए इसमें धनराशि भी डालते हैं, और यही धनराशि इस डेक में से निकालकर इसके पैसे से डेक पकाई जाती है।

दरगाह अजमेर शरीफ

और जरूरत मन्दों में इसको वितरित किया जाता है, दरगाह के अंदर आप जाएंगे तो बाहर ही दो लोग दरगाह के मुख्य दरवाजे पर बैठे हुए हैं। उनसे भी पहले रसीद कटवानी पड़ेगी और अंदर जाकर आपको दरगाह पर चढ़ी हुई चादर को सिर पर लगाने के लिए पैसे देने होंगे।

 

दरगाह पर जो जायरीनआते हैं वह गरीबों के लिए पैसा देकर जाते है ,वह देते हैं गरीबों के लिए लेकिन दरगाह के कारिंदे स्वस्थ और संपन्न होते हुए भी दरगाह पर आने वाली धनराशि से और अधिक स्वस्थ और संपन्न होते चले जाते हैं।

तो यह स्थिति केवल मंदिरों की नहीं है, दरगाहों में भी यही स्थिति है दरगाहों में भी पैसे की और वहां चढ़ाए जाने वाली विशेष वस्तुओं की बंदर बांट तो होती है।

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